नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने इस्कॉन द्वारा संचालित स्कूलों में यौन शोषण की कथित घटनाओं की जांच का अनुरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं से मंगलवार को कहा कि वे अपनी शिकायतों के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) से संपर्क करें.
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि यदि उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के राज्य बाल अधिकार आयोगों के समक्ष इस तरह के अभ्यावेदन प्रस्तुत किए जाते हैं, तो उन पर उचित समय में विचार किया जाना चाहिए.
पीठ ने कहा, ”हम इस याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को एनसीपीसीआर, उप्र एससीपीसीआर और पश्चिम बंगाल एससीपीसीआर को एक नया अभ्यावेदन-अनुस्मारक (रिमाइंडर) देने की स्वतंत्रता सुरक्षित रखते हैं, ताकि इस याचिका में लगाए गए आरोपों को इन प्रतिवादियों के संज्ञान में लाया जा सके.” शीर्ष अदालत रजनीश कपूर और अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ‘अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ’ (इस्कॉन) द्वारा संचालित स्कूलों में यौन शोषण के कथित मामलों की जांच का अनुरोध किया गया था.
याचिका में आरोप लगाया गया था कि आंतरिक रिकॉर्ड यौन शोषण के गंभीर मामलों का संकेत देते हैं और अधिकारियों से की गई शिकायतों का कोई जवाब नहीं मिला. वकील तुषार मनोहर खैरनार के माध्यम से दाखिल याचिका में कहा गया, ”यह जनहित याचिका इसलिए दायर की गई है क्योंकि प्रतिवादी 1 से 11 संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त बच्चों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और पूरे भारत में इस्कॉन द्वारा संचालित संस्थानों में हुए उनके शारीरिक और यौन शोषण को रोकने की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं.” याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने प्रतिवादियों के समक्ष शिकायत दायर की है और उसमें बच्चों के साथ हुए इस तरह के यौन और शारीरिक उत्पीड़न का विवरण दिया है.
नफरत भरे भाषण की हर घटना पर कानून बनाने या निगरानी रखने को तैयार नहीं: न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह देश भर में घृणा भाषण की हर घटना पर कानून बनाने या उस पर निगरानी रखने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि इसके लिए कानूनी उपाय, पुलिस थाने और उच्च न्यायालय मौजूद हैं. यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की, जो एक खास समुदाय के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के कथित आ”ान का मुद्दा उठाने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी.
पीठ ने कहा, ”हम इस याचिका के मद्देनजर कानून नहीं बना रहे हैं. निश्चिंत रहें, हम इस देश के किसी भी इलाके में होने वाली हर छोटी घटना पर कानून बनाने या उस पर निगरानी करने के लिए तैयार नहीं हैं. उच्च न्यायालय हैं, पुलिस थाने हैं, कानूनी उपाय हैं. वे पहले से ही मौजूद हैं.” शीर्ष अदालत ने शुरू में आवेदक से कहा था कि वह अपनी शिकायत के साथ संबंधित उच्च न्यायालय जाए.
पीठ ने आवेदक की ओर से मामले में पेश हुए वकील से कहा, ”यह अदालत पूरे देश में ऐसे सभी मामलों पर कैसे नजर रख सकती है? आप अधिकारियों से संपर्क करें. उन्हें कार्रवाई करने दें, नहीं तो उच्च न्यायालय जाएं.” वकील ने कहा कि उन्होंने एक लंबित रिट याचिका में एक आवेदन दाखिल किया है जिसमें घृणा भाषण का मुद्दा उठाया गया है.
अदालत में उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जनहित किसी एक धर्म विशेष तक सीमित नहीं रह सकता.
उन्होंने कहा, ”सभी धर्मों में नफरत भरे अनेक भाषण दिये जा रहे हैं. मैं उस बारे में विवरण अपने मित्र (आवेदक) को दे दूंगा.” आवेदक के वकील ने कहा कि वह इस मामले को अदालत के संज्ञान में लाए हैं क्योंकि अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे.
