मेरा राजनीतिक करियर गांधी परिवार ने ही बनाया और उसी ने खत्म किया : मणिशंकर अय्यर

नयी दिल्ली. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने इसे अपने जीवन की विडंबना बताया है कि गांधी परिवार ने ही उनका राजनीतिक करियर बनाया और गांधी परिवार ने उसे खत्म भी किया. अय्यर ने यह भी कहा कि 10 साल तक उन्हें एक बार के अलावा सोनिया गांधी से अकेले मिलने या राहुल गांधी के साथ कोई सार्थक समय बिताने का मौका नहीं दिया गया.

‘जगरनॉट’ द्वारा प्रकाशित अपनी आगामी पुस्तक ”ए मैवरिक इन पॉलिटिक्स’ पर ‘पीटीआई वीडियो’ के साथ एक साक्षात्कार में अय्यर ने कहा कि उन्हें ‘सब कुछ मिला’ लेकिन अंत में वह ‘पार्टी में पूरी तरह से अलग-थलग’पड़ गए. हालांकि, उन्होंने कहा कि वह अब भी पार्टी के सदस्य हैं.

उन्होंने जोर देकर कहा, ”मैं कभी नहीं बदलूंगा, और मैं निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में नहीं जाऊंगा.” गांधी परिवार के संरक्षण के बारे में पूछे जाने पर अय्यर ने कहा, ”यदि आप एक व्यक्ति के रूप में राजनीति में सफल होना चाहते हैं, तो आपके पास एक बहुत मजबूत आधार होना ही चाहिए. या तो आपके पास एक निर्वाचन क्षेत्र हो जहां आप कभी हारे नहीं हों या आप अपराजेय हों, या आपका कोई जातिगत या धार्मिक आधार हो, मेरे पास इनमें से कुछ भी नहीं था.”

उन्होंने कहा, ”मुझे केवल संरक्षण प्राप्त था. मुझे (पूर्व) प्रधानमंत्री राजीव गांधी का समर्थन प्राप्त था. तब मुझे सोनिया गांधी का भी समर्थन प्राप्त था. लेकिन राजनीति में रहने के लिए यह एक बहुत ही अनिश्चित आधार है. इसलिए जब सोनिया गांधी गुस्सा हो गईं 2010 में, तो वह संरक्षण वापस ले लिया गया. हालांकि, इसे अभी तक पूरी तरह वापस नहीं लिया गया है.” अय्यर ने कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर सोनिया गांधी के मन में उनके प्रति कुछ स्नेह अब भी है.

उन्होंने साक्षात्कार के दौरान कहा, ”तो यह बहुत धीमी गिरावट थी. लेकिन यह गिरावट लगभग 15 वर्षों की अवधि में हुई… और फिर, एक बार जब राहुल गांधी आए तो मुझे लगा कि यह बढ़ने वाला है. क्योंकि उन्होंने मुझसे कहा था जहां वह मुझसे 75 प्रतिशत सहमत हुआ करते थे, वहां उन्होंने कहा कि अब मैं आपसे 100 प्रतिशत सहमत हूं.” अय्यर ने कहा,”और फिर उन्होंने अपनी मां से कांग्रेस में मेरे एकमात्र पद से मुझे हटाने के लिए कहकर यह साबित कर दिया कि वह मुझसे 100 प्रतिशत सहमत हैं. यह पार्टी के पंचायती राज संगठन के राष्ट्रीय संयोजक का पद था, जिसका नाम राजीव गांधी के नाम पर रखा गया था. इसके बाद उन्होंने मुझसे मिलने से इनकार कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि आज, मैं पूरी तरह से अलग-थलग हूं.” अय्यर ने कहा कि जिस परिवार ने उन्हें अवसर दिया था, उसी परिवार ने उनसे वह अवसर वापस ले लिया.

उन्होंने कहा, ”कारण यह दिया गया है कि मुझे सब कुछ मिला है. और मेरे पास है भी. मैं सत्ता पक्ष के रूप में संसद का सदस्य रहा हूं. मैं सांसद के रूप में विपक्ष में भी रहा हूं. मैं मंत्री रहा हूं. मैं मंत्रालय से बाहर हो गया हूं और अब भी सांसद हूं, इसलिए मेरे पास सब कुछ है, लेकिन मैं पार्टी में पूरी तरह से अलग-थलग हूं.” दिग्गज नेता ने कहा कि 10 साल तक उन्हें सोनिया गांधी से प्रत्यक्ष मुलाकात या राहुल गांधी के साथ कोई सार्थक समय बिताने का मौका नहीं दिया गया.

उन्होंने कहा, ”मैंने दो मौकों को छोड़कर प्रियंका के साथ भी मेरी मुलाकात नहीं हुई है. वह मुझसे फोन पर बात करती हैं, इसलिए मैं उनके संपर्क में हूं. इसलिए मेरे जीवन की विडंबना यह है कि मेरा राजनीतिक करियर गांधी परिवार ने बनाया और गांधी परिवार ने ही इसे खत्म कर दिया.” अय्यर ने अपनी पुस्तक के एक अध्याय में अपने ‘गिरावट…ओझल…पतन’ का विवरण दिया है. अय्यर ने किताब में कहा है कि 2010 में एक साक्षात्कार में दिग्विजय सिंह ने नक्सलवाद से निपटने के बारे में विचार व्यक्त किए थे. अंत में जब सिंह से पूछा गया कि क्या उन्होंने अपने विचारों से तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम को अवगत कराया था, तो उन्होंने चिदंबरम को ‘अहंकारी’ और ‘सलाह नहीं सुनने वाला’ व्यक्ति बताया था.

वह बताते हैं कि कैसे अगले दिन एक टीवी रिपोर्टर ने सिंह के साक्षात्कार पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी, और नक्सलवाद पर टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था, ”मैं उनसे ‘एक लाख प्रतिशत’ सहमत हूं.” उन्होंने कहा, ”साक्षात्कार के अंत में रिपोर्टर ने पूछा कि क्या मैं केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम के बारे में दिग्विजय की राय से सहमत हूं, तो मैंने सावधानी से जवाब दिया कि चूंकि पीसी तमिलनाडु राज्य में मेरे वरिष्ठ सहयोगी हैं, इसलिए मैं उन पर टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा.” किताब में अय्यर कहते हैं कि जब टेलीविजन पर साक्षात्कार को प्रसारित किया गया तो ‘एक लाख प्रतिशत’ टिप्पणी को अधिक ‘हाइलाइट’ किया गया और चिदंबरम पर ‘कोई टिप्पणी नहीं’ को हटा दिया गया.

वह आगे बताते हैं कि कैसे 15 अप्रैल, 2010 को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने से ठीक एक घंटे पहले, उन्हें इस मुद्दे पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से फोन पर फटकार मिली थी. अय्यर ने कई विवादों के बारे में विस्तार से बताया, जिसमें 2017 का ‘नीच’ टिप्पणी विवाद और उसके बाद पार्टी से उनका निलंबन भी शामिल है. वह बताते हैं कि उस घटना के साथ गांधी परिवार के साथ उनकी दूरियां कैसे बढ़ गईं, उन्होंने कहा कि उनके पतन की तारीख सात दिसंबर, 2017 कही जा सकती है, जब उन्होंने यह टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा कि इसके बाद राहुल गांधी ने उन्हें इस तरह दूर रखा जैसे कि वह ‘कोई राजनीतिक कोढ़ी’ हों.

अय्यर ने कहा कि उन्हें राहुल गांधी से बात करने की अनुमति नहीं दी गई जब तक कि उनका पार्टी से निलंबन रद्द नहीं हो जाता. इस बीच राहुल गांधी का जन्मदिन कुछ हफ्ते बाद आने वाला था तो अय्यर ने सोचा कि यह पार्टी में दोबारा शामिल होने के लिए अपने मामले पर जोर देने का अवसर है. इसके बाद उन्होंने जन्मदिन के बधाई पत्र के बहाने अपने निलंबन को रद्द करने के लिए एक पत्र तैयार किया.

अय्यर कहते हैं, ”मसौदा पत्र भेजने से पहले इसे मैंने पत्नी सुनीत को सौंपा तो वह चिल्लाने लगीं. उन्होंने कहा, ‘क्या आपके पास कोई आत्म-सम्मान नहीं है?’ उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आप इस तरह क्यों घबरा रहे हो?’ मैं वाकई इसका कारण नहीं जानता था. यह वह मानक तरीका था जिसमें कांग्रेसी अपने अधिकारों के लिए अपने अध्यक्ष से भीख मांगते थे.” उन्होंने कहा, ”यहां मैं, सुनीत ने जवाब दिया, अपने से 30 साल छोटे व्यक्ति के सामने घुटने टेककर भीख मांग रहा था. किस लिए? तीन दशकों तक पार्टी की सेवा करने और उनके पिता का साथ देने के लिए?”

मणिशंकर ने कहा, ”मुझे क्या चाहिए था? पिछली चौथाई सदी में अपनी योग्यता साबित करने के बाद कांग्रेस की छत्रछाया में एक छोटा सा कोना? क्या मुझे एहसास नहीं हुआ कि मुझे उन लोगों द्वारा बलि का बकरा बनाया जा रहा था जो खुद को बचाना चाहते थे? क्या मुझे ये दिखाई नहीं दे रहा था कि उनके लिए मैं अब किसी काम का नहीं था, तो मुझे गंदे ‘टिशू पेपर’ की तरह फेंका जा रहा था? मैं अपने सम्मान को बचाए रखते हुए क्यों न चला जाऊं?” इसके बाद अय्यर ने दोनों पत्रों को खारिज करने के बाद एक तीसरा पत्र लिखा जिसे उनकी पत्नी ने देखने से भी इनकार कर दिया, लेकिन उन्होंने इस पत्र को भेज दिया. इसके बाद उन्हें एक हफ्ते के इंतजार के बाद पत्र का जवाब मिला जिसमें उन्हें जन्मदिन की शुभकामना देने के लिए महज धन्यवाद कहा गया था जैसा कि राहुल गांधी ने सैंकड़ों लोगों को भेजा होगा.

फिर अचानक एक दिन, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी के राजू, जो उस समय राहुल गांधी के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक थे, उन्हें गोपनीय रूप से सूचित करने के लिए आए कि उन्हें राजीव गांधी के जन्मदिन, 20 अगस्त को पार्टी में फिर से शामिल किया जा रहा है. किताब के मुताबिक, उस दिन उनकी राहुल गांधी से मुलाकात होनी थी, लेकिन निलंबन तो रद्द हो गया पर मुलाकात नहीं हुई.

प्रणब को 2012 में प्रधानमंत्री, मनमोहन को राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए था: मणिशंकर अय्यर

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने अपनी नयी पुस्तक में कहा है कि 2012 में जब राष्ट्रपति पद रिक्त हुआ था तब प्रणब मुखर्जी को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग)-दो सरकार की बागडोर सौंपी जानी चाहिए थी और मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए था. अय्यर (83) ने पुस्तक में लिखा है कि यदि उस समय ऐसा किया गया होता तो संप्रग सरकार ”शासन के पंगु बनने” की स्थिति में नहीं पहुंचती.

उन्होंने कहा कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में बनाए रखने और प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन भेजने के निर्णय ने संप्रग के तीसरी बार सरकार गठित करने की संभावनाओं को ”खत्म” कर दिया. अय्यर ने अपनी पुस्तक ‘ए मैवरिक इन पॉलिटिक्स’ में ये विचार रखे हैं. इस पुस्तक को ‘जगरनॉट’ ने प्रकाशित किया है.

पुस्तक में अय्यर ने राजनीति में अपने शुरुआती दिनों, पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शासनकाल, संप्रग-एक में मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल, राज्यसभा में अपने कार्यकाल और फिर अपनी स्थिति में ”गिरावट…परिदृश्य से बाहर होने…पतन” का जिक्र किया है.
अय्यर ने लिखा, ”2012 में प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) को कई बार ‘कोरोनरी बाइपास सर्जरी’ करानी पड़ी. वह शारीरिक रूप से कभी पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो पाए. इससे उनके काम करने की गति धीमी हो गई और इसका असर शासन पर भी पड़ा. जब प्रधानमंत्री का स्वास्थ्य खराब हुआ, लगभग उसी समय (तत्कालीन) कांग्रेस अध्यक्ष (सोनिया गांधी) भी बीमार पड़ी थीं लेकिन पार्टी ने उनके स्वास्थ्य के बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की.”

उन्होंने कहा कि जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि दोनों कार्यालयों – प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष – में गतिहीनता थी, शासन का अभाव था जबकि कई संकटों, विशेषकर अन्ना हजारे के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन से या तो प्रभावी ढंग से निपटा नहीं गया या फिर उनसे निपटा ही नहीं गया.

उन्होंने लिखा, ”…व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि जब 2012 में राष्ट्रपति पद खाली हुआ था तो प्रणब मुखर्जी को सरकार की बागडोर सौंपी जानी चाहिए थी और डॉ. मनमोहन सिंह को भारत का राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए था.” अय्यर ने कहा, ”…प्रणब के संस्मरणों से पता चलता है कि वास्तव में इस पर विचार किया गया था.” अय्यर ने कहा, ”…किन्हीं कारणों से, जिनकी जानकारी न तो मुझे और न ही संभवत: किसी और थी, डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में बनाए रखने और प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति के रूप में ऊपर भेजने का निर्णय लिया गया.”

उन्होंने मुखर्जी को 2012 में प्रधानमंत्री बनाए जाने के अपने विचार को लेकर ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”…मुझे लगता है कि अगर डॉ. मनमोहन सिंह राष्ट्रपति और प्रणब प्रधानमंत्री बन गए होते, तो भी हमें 2014 में हार का सामना करना पड़ता लेकिन यह हार इतनी अपमानजनक नहीं होती कि हम मात्र 44 सीट पर सिमट जाते.” उन्होंने कहा कि 2013 में हर कोई बीमारी से उबर रहा था और इसलिए हमारे खिलाफ कई आरोप लगाए गए जो अदालत में कभी साबित नहीं हुए थे.

अय्यर ने अपनी किताब में कहा कि सरकार और पार्टी की ऐसी विश्वसनीयता नहीं रह सकी कि वे मामलों को स्पष्ट रूप से सनसनीखेज तरीके से दिखाने के भूखे मीडिया के आरोपों का जवाब दे सकें और उन्होंने सोचा कि संबंधित मंत्रियों के इस्तीफे से मुद्दों को खत्म किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इससे कुछ भी हल नहीं निकला और अप्रमाणित आरोपों ने सरकार की प्रतिष्ठा को और नुकसान पहुंचाया.

मोदी को कभी ‘चायवाला’ नहीं कहा: अय्यर

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी को कभी ‘चायवाला’ नहीं कहा और भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) नेता के प्रधानमंत्री पद के लिए अनुपयुक्त होने संबंधी उनकी धारणा का चाय बेचने के उनके अतीत से कोई लेना-देना नहीं था. अय्यर ने 2014 के आम चुनावों से पहले अपनी टिप्पणियों से उपजे विवाद का जिक्र अपनी पुस्तक ‘ए मैवरिक इन पॉलिटिक्स’ में किया है, जिसे ‘जगरनॉट’ द्वारा प्रकाशित किया गया है.

अय्यर (83) ने पुस्तक में कहा है कि 2014 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी को आगामी आम चुनावों में स्पष्ट विजेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा था. उन्होंने पुस्तक में लिखा, “मैं इस बात से बहुत भयभीत था कि जिस व्यक्ति की छवि गुजरात में 2002 में मुसलमानों के नरसंहार के कारण दागदार है, वह महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के भारत का नेतृत्व करने की आकांक्षा रख सकता है.” अय्यर ने कहा कि इसलिए, जनवरी 2014 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के पूर्ण अधिवेशन के दौरान एक साक्षात्कार में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह अपमानजनक है कि एक ऐसा व्यक्ति जो यह नहीं जानता कि सिकंदर कभी पाटलिपुत्र नहीं आया था या तक्षशिला पाकिस्तान में था, वह उस पद पर आसीन होने की कोशिश कर रहा है, जिस पर कभी जवाहरलाल नेहरू आसीन थे.

अय्यर ने कहा, ”मैंने कहा था कि ‘भारत के लोग यह कभी स्वीकार नहीं करेंगे.’ फिर मैंने मजाक में कहा था कि अगर चुनाव हारने के बाद भी मोदी चाय परोसना चाहते हैं, तो हम उनके लिए कुछ व्यवस्था कर सकते हैं.” अय्यर ने अपनी पुस्तक में लिखा, “तब से लेकर अब तक यह कहा जा रहा है कि मैंने कहा था कि मोदी इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि वह ‘चायवाले’ थे. मैंने कभी मोदी को ‘चायवाला’ नहीं कहा और न ही कभी यह कहा कि चायवाला होने की वजह से वह कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे.” उन्होंने लिखा कि वास्तव में अपने आपको ‘चायवाला’ कहने वाले खुद मोदी थे.

कांग्रेस नेता ने कहा, “मेरे बयान का वीडियो यूट्यूब पर अब भी उपलब्ध है, जिसे कोई भी देख सकता है.” पुस्तक में अय्यर ने ”नीच” टिप्पणी विवाद समेत अपने साथ जुड़े अन्य विवादों का भी जिक्र किया. अय्यर ने दावा किया कि मोदी ने उनकी टिप्पणियों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया. कांग्रेस नेता ने दावा किया कि यह ”पूरी तरह झूठ” है कि उन्होंने मोदी को ”नीच जाति” का व्यक्ति कहा था.

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