
नयी दिल्ली. वक्फ संशोधन विधेयक पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति की बैठक में सोमवार को सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के सदस्यों के बीच तीखी नोंकझोक हुई. समिति के समक्ष विभिन्न राज्यों के पूर्व न्यायाधीश और वक्फ प्रशासक पेश हुए. तृणमूल कांग्रेस के सदस्य कल्याण बनर्जी के निलंबन के बाद समिति की यह पहली बैठक थी. पिछले सप्ताह समिति की बैठक के दौरान बनर्जी ने एक कांच की बोतल तोड़ दी थी और उसे समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल की ओर कथित तौर पर फेंक दिया था. इसके बाद उन्होंने समिति से एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया था. ऐसे में वह सोमवार की बैठक में उपस्थित नहीं थे.
संसदीय समिति की बैठक में सोमवार को शुरुआत से ही गतिरोध बना रहा. आम आदमी पार्टी के सदस्य संजय सिंह ने दिल्ली वक्फ बोर्ड के प्रशासक अश्विनी कुमार की प्रस्तुति पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया था कि उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को दिल्ली की मुख्यमंत्री द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया. इसके बाद संजय सिंह, कांग्रेस सदस्य नासिर हुसैन और मोहम्मद जावेद, एआईएमआईएम सदस्य असदुद्दीन ओवैसी, समाजवादी पार्टी के सदस्य मोहिबुल्ला, द्रमुक सदस्य एम एम अब्दुल्ला और तृणमूल कांग्रेस के मोहम्मद नदीम-उल हक बैठक से कुछ देर के लिए बहिर्गमन कर गए.
सूत्रों ने बताया कि विपक्षी सदस्यों ने बहिर्गमन से पहले संसदीय समिति के उपस्थिति रोस्टर से अपने हस्ताक्षर भी हटा दिए.
दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी ने वक्फ संशोधन विधेयक पर संयुक्त समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल को एक पत्र लिखकर दिल्ली वक्फ बोर्ड की रिपोर्ट को ”अमान्य” करने का आग्रह किया था. उनका कहना है कि यह दिल्ली सरकार की मंजूरी के बिना भेजी गई है.
विपक्षी सदस्य दिल्ली वक्फ बोर्ड की एक प्रस्तुति पर अपनी आपत्ति पर कायम रहे, इसलिए समिति अध्यक्ष ने इस मामले पर लोकसभा महासचिव की राय लेने का फैसला किया.
दिल्ली वक्फ बोर्ड के अधिकारी कुमार, महासचिव की राय के बाद थोड़ी देर के लिए समिति के समक्ष उपस्थित हुए कि वह अपने विचार रख सकते हैं. उम्मीद है कि वह मंगलवार को भी अपनी बात जारी रखेंगे. विपक्षी सदस्यों ने न्यायमूर्ति एस एन ढींगरा (सेवानिवृत्त) और अन्य पूर्व न्यायाधीशों की उपस्थिति पर भी आपत्ति जताई और दावा किया कि वे विचाराधीन मामले में हितधारक नहीं हैं.
सूत्रों का कहना है कि भाजपा सदस्यों ने तर्क दिया कि समिति न्यायपालिका में उनके व्यापक अनुभव से लाभान्वित होगी. विपक्षी सदस्यों ने उनके द्वारा सुने गए उन मामलों का हवाला दिया, जिनसे राजनीतिक विवाद पैदा हो गया था. उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने यह सुझाव दिया कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) एक अलग वक्फ कानून की आवश्यकता को अप्रासंगिक बना देगी.
शम्स ने समिति को बताया कि उत्तराखंड द्वारा यूसीसी के कार्यान्वयन से इसे जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाएगा और किसी भी व्यक्तिगत कानून की आवश्यकता नहीं होगी. शम्स की यह राय भी थी कि उत्तराखंड में वक्फ भूमि शहीदों के परिजनों को आवंटित की जाए, क्योंकि पहाड़ी राज्य का सशस्त्र बलों में बड़ा प्रतिनिधित्व है. संसदीय समिति ने हरियाणा और पंजाब के वक्फ बोर्डों के प्रतिनिधियों की बात भी सुनी.
