एसआईआर के डर से बांग्लादेश वापसी को मजबूर : बंगाल के राज्यपाल ने हकीमपुर सीमा का दौरा किया

कोलकाता/हकीमपुर. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में हकीमपुर सीमा चौकी का दौरा किया. मीडिया में ऐसी खबरें आई थीं कि निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य की मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)कराए जाने के मद्देनजर बांग्लादेश से अवैध रूप से देश में आए प्रवासी ‘घर वापसी’ (रिवर्स माइग्रेशन) कर रहे हैं. हकीमपुर सीमा चौकी की जमीनी स्थिति का जायजा लेने के लिए राज्यपाल ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की तथा शाम को वहां पहुंचने पर स्थानीय लोगों से भी बातचीत की. अधिकारियों ने बताया कि मंगलवार को राज्यपाल का मुर्शिदाबाद के सीमावर्ती इलाकों का दौरा करने का कार्यक्रम है.

बोस ने कोलकाता में संवाददाताओं से कहा, “राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों द्वारा अपने देश लौटने की कोशिशों की मीडिया में आई खबरों की कई व्याख्याएं की जा रही हैं. मैं जमीनी हालात का अपनी आंखों से जायजा लेना चाहता हूं, ताकि मैं खुद कोई राय बना सकूं.” उन्होंने कहा कि एसआईआर भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा किया जा रहा एक “अहम और महत्वपूर्ण” कार्य है. बोस ने कहा, “अगर इसके खिलाफ कोई शिकायत है, तो मुझे विश्वास है कि निर्वाचन आयोग उन सभी का समाधान करेगा. मुझे उम्मीद है कि सब कुछ ठीक रहेगा. अंत भला, तो सब भला.”

हकीमपुर में इतिहास अपने आप को दोहरा रहा :जहां कभी लोग आए थे, अब वहीं से लौट रहे
हकीमपुर सीमा चौकी तक जाने वाली कीचड़ भरी पगडंडी एक वक्त में 1947 और फिर 1971 में शरणार्थियों के गुजरने का रास्ता हुआ करती थी और तब से दशकों से लोग इस रास्ते से देश में घुस रहे थे जिससे यह गांव सीमा पार हिंसा से बचकर भाग रहे लोगों के लिए एक शरणस्थली में बदल गया.

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में बांग्लादेश से सटे हकीमपुर गांव के बुजुर्गों का कहना है कि इस नवंबर में इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है. बस अब दिशा और संदर्भ बदल गए हैं.पिछले कुछ दिनों से अवैध बांग्लादेशी नागरिक उसी सीमा चौकी की ओर वापस जा रहे हैं, जहां से दशकों पहले पड़ोसी देश से शरणार्थियों का बड़ा जत्था आया था.

सुरक्षा अधिकारियों, ग्रामीणों और प्रवासियों के ही अनुसार, इसकी वजह पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की जारी प्रक्रिया है. घर-घर जाकर किए जा रहे सत्यापन के कारण वर्षों से नकली दस्तावेज या फर्जी पहचान पत्र के साथ यहां रह रहे लोग जानते हैं कि वे जांच में पकड़े जाएंगे. कई लोग अधिकारियों के पहुंचने से पहले ही चुपचाप वापस लौटने का फैसला कर रहे हैं.

बांग्लादेश के 1974 के मुक्ति संग्राम के दौरान शरणार्थियों के लिए काम करने वाले 79 वर्षीय हरिपद मंडल ने कहा, ”मैंने कभी हकीमपुर में ऐसा दृश्य नहीं देखा कि इतने अवैध बांग्लादेशी अपने देश लौटने का इंतजार कर रहे हों. यह अभूतपूर्व है.” वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 10,145 की आबादी और 2,322 मकानों वाला हकीमपुर हमेशा सीमा पार आवाजाही की यादों के साथ जीता आया है. 1971 में यही रास्ता हजारों लोगों को लेकर आया था, जो पाकिस्तान सेना के नरसंहार और ऑपरेशन सर्चलाइट से बचकर भाग रहे थे.

अनिमेष मजूमदार (84) ने याद किया, ”हर आंगन शिविर था, हर घर शरण स्थल था.” उन्होंने कहा, ”इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है. बस दिशा बदल गयी है.” सीमा पार करने का इंतजार कर रहे शरणार्थियों का कहना है कि फैसला स्पष्ट है: एसआईआर टीमों के घर-घर जाकर सत्यापन करने के साथ ”अधिकारियों से बचना अब संभव नहीं है.” शाहीदुल (32) ने कहा, ”मैं बनगांव की ईंट भट्टी में काम करता था. पहचान पत्र उधार का है. मैं कानूनी दस्तावेज नहीं दिखा सकता. अब लौटना ही बेहतर है.” हकीमपुर में सुरक्षार्किमयों का कहना है कि शरणार्थियों के लौटने की संख्या स्थिर और स्पष्ट है.

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया, ”नवंबर के दूसरे सप्ताह से सीमा पार वापसी करने वालों की संख्या लगातार ब­ढ़ रही है.” उन्होंने कहा, ”ज़्यादातर शरणार्थी खुलेआम स्वीकार करते हैं कि वे सालों पहले काम के लिए अवैध रूप से आए थे. वे सभी अपनी वापसी के लिए एसआईआर को जिम्मेदार ठहराते हैं. यह स्वैच्छिक वापसी है, जबरदस्ती नहीं है.”

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