नयी दिल्ली. कांग्रेस ने एक खबर का हवाला देते हुए सोमवार को आरोप लगाया कि केंद्र सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को खत्म करने का सुनियोजित प्रयास कर रही है. पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने जिस खबर उल्लेख किया, उसमें दावा किया गया है कि अक्टूबर-नवंबर में मनरेगा लाभार्थियों के डेटाबेस से 27 लाख नाम हटा दिए गए.
रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”एक और दिन, भारत के ग्रामीण गरीबों को रोजग़ार के उनके विधायी अधिकार से वंचित करने का एक और प्रयास. पिछले एक महीने में 10 अक्टूबर से 14 नवंबर के बीच मोदी सरकार ने मनरेगा लाभार्थियों के डेटाबेस से 27 लाख नाम हटा दिए हैं. इनमें से छह लाख लाभार्थी सक्रिय श्रमिक थे.” उन्होंने दावा किया कि लाभार्थियों के नामों का यह सामूहिक विलोपन श्रमिकों के लिए ‘ई-केवाईसी’ प्रक्रिया की शुरुआत के साथ मेल खाता है.
कांग्रेस महासचिव ने कहा, ”जैसा कि हमने यह विषय बार-बार उठाया है कि यह कोई अलग कदम नहीं है, बल्कि पारर्दिशता की आड़ में आधार-आधारित डिजिटल प्रक्रियाओं को लागू करके मनरेगा को समाप्त करने का एक सुनियोजित प्रयास है.” उन्होंने कहा, ”इस ऐतिहासिक कानून के विरुद्ध मोदी सरकार के अपराधों में राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली (एनएमएमएस) ऐप और आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (एबीपीएस) की शुरुआत शामिल है, जिसने अनुमानित दो करोड़ श्रमिकों को काम और भुगतान के अपने कानूनी अधिकार को सुरक्षित करने से रोक दिया है.”
रमेश ने कहा, ”कांग्रेस लगातार यह मांग करती रही है कि बजट में उल्लेखनीय वृद्धि और समय पर वेतन भुगतान की नीति का सख्त कार्यान्वयन हो, वास्तविक आय वृद्धि को गति देने के लिए न्यूनतम 400 रुपये प्रतिदिन मनरेगा मज.दूरी की जाए, भविष्य में मनरेगा मज.दूरी निर्धारित करने के लिए एक स्थायी समिति का गठन हो तथा एबीपीएस, एनएमएमएस और ई-केवाईसी जैसी तकनीकों को अनिवार्य रूप से अपनाने पर तत्काल रोक लगाई जाए.”
दस अक्टूबर से 14 नवंबर तक मनरेगा से 27 लाख श्रमिकों के नाम हटाये गये : रिपोर्ट
देश में 10 अक्टूबर और 14 नवंबर के बीच मनरेगा से लगभग 27 लाख श्रमिकों को हटा दिया गया, जो ‘बिल्कुल असामान्य’ है. एक रिपोर्ट से यह बात सामने आयी है. शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं के एक समूह ‘लिब टेक इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसी अवधि के दौरान इस प्रमुख ग्रामीण आजीविका योजना में लगभग 10.5 लाख श्रमिकों को जोड़ा भी गया.
रिपोर्ट में बताया गया है कि मनरेगा से जुड़ने वाले श्रमिकों में यह वृद्धि उस अवधि में हुई, जब एक नवंबर, 2025 से इस योजना के तहत ई-केवाईसी को अनिवार्य कर दिया गया. इस दौरान बड़ी संख्या में इस योजना से श्रमिकों के नाम हटाये भी गये. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 के कार्यान्वयन पर छमाही रिपोर्ट में कहा गया है, ”एक महीने में इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाना अत्यंत असामान्य बात है.” महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एमजीएनआरईजीएस) को मनरेगा या नरेगा के नाम से भी जाना जाता है. यह एक ऐसी प्रमुख योजना है, जिसका उद्देश्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आजीविका सुरक्षा को बढ.ाना है. इसके तहत, प्रत्येक वित्त वर्ष में हर उस परिवार को कम से कम 100 दिनों का रोजगार प्रदान किया जाता है, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल श्रमिक कार्य करने के लिए इच्छुक होते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय रुझान वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल और सितंबर के बीच पहले छह महीनों के लिए शुद्ध वृद्धि दर्शाता है.
इस अवधि में मनरेगा से लगभग 15.2 लाख श्रमिकों को हटाया गया और 98.8 लाख श्रमिकों को जोड़ा गया, जिससे कुल वृद्धि 83.6 लाख हुई. सितंबर के अंत तक मनरेगा से कुल 83.6 लाख श्रमिक जुड़े, लेकिन 14 नवंबर तक मजदूरों के हटने के बाद यह संख्या तेज.ी से घटकर 66.5 लाख रह गई.
इस एक महीने में साल भर का रुझान उलट गया. रिपोर्ट में कहा गया है, ”इसका मतलब यह है कि प्रणाली ने एक महीने में लगभग 17 लाख शुद्ध श्रमिकों को खो दिया, जो पिछली प्रवृत्ति से एक नाटकीय उलटफेर है.”
